मौसम अपडेट NK संगवारी जनता के गोठ: देश में सूखे की आहट, 11 साल बाद कमजोर मानसून से बढ़ेगा महंगाई का पारा; जानें आप पर क्या होगा असर

 



नई दिल्ली/बिलासपुर। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने देश की अर्थव्यवस्था और आम आदमी की रसोई को हिला देने वाली एक बड़ी चेतावनी जारी की है। मौसम विभाग ने साल 2026 के दक्षिण-पश्चिम मानसून के अपने पूर्वानुमान को घटाकर दीर्घकालिक औसत (LPA) का 90 प्रतिशत कर दिया है। यह साल 2015 के बाद यानी पिछले 11 वर्षों में भारत का सबसे कमजोर मानसून होने जा रहा है, जिसने देश में भयंकर सूखे और बेकाबू महंगाई के खतरे को जन्म दे दिया है।

​📉 आखिर क्यों रूठ रहे हैं बादल? (सुपर अल-नीनो का साया)

​पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के सचिव एम. रविचंद्रन और आईएमडी के महानिदेशक डॉ. मृत्युंजय महापात्र ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि प्रशांत महासागर में तेजी से 'अल-नीनो' (El Niño) सक्रिय हो रहा है।

​जून में अल-नीनो का असर हल्का रहेगा, जिससे इस महीने 92% बारिश होने की उम्मीद है।

​जुलाई और अगस्त के मुख्य महीनों में यह 'कमजोर से मध्यम' स्तर पर पहुंचेगा।

​सितंबर आते-आते यह 'मध्यम से मजबूत' (Super El Niño) रूप ले सकता है, जिससे मानसून सीजन के आखिरी महीनों में बारिश पूरी तरह गायब हो सकती है।

​🌾 किन राज्यों और फसलों पर मंडरा रहा है सबसे बड़ा खतरा?

​भारत की लगभग 4 ट्रिलियन (लाख करोड़) डॉलर की अर्थव्यवस्था में आज भी लगभग आधी कृषि भूमि सिंचाई के लिए केवल बारिश पर निर्भर है। मौसम विभाग के मुताबिक:

​कोर कृषि क्षेत्र प्रभावित: देश का मुख्य कृषि क्षेत्र (Monsoon Core Zone), जिसमें मध्य भारत, उत्तर-पश्चिम भारत और दक्षिणी प्रायद्वीप शामिल हैं, वहां सामान्य से बहुत कम (94% से भी कम) बारिश होने की आशंका है।

​उत्तर-पश्चिम भारत सबसे सूखा: पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में बारिश का आंकड़ा 92% से नीचे गिर सकता है।

​पूर्वोत्तर में राहत: केवल पूर्वोत्तर भारत (North-East) ही ऐसा क्षेत्र है, जहां मानसून सामान्य (94% से 106%) रहने की उम्मीद है।

​⚠️ खरीफ फसलों पर मार: जुलाई और अगस्त के महीनों में ही धान (चावल), दालें (तुअर, उड़द), तिलहन (सोयाबीन, मूंगफली) और सब्जियों की बुआई होती है। बारिश की भारी कमी से इन फसलों का उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हो सकता है।

​💸 कैसे बढ़ेगी आपकी जेब पर मार? (महंगाई का चक्रव्यूह)

​आर्थिक विशेषज्ञों और आईडीएफसी फर्स्ट बैंक की मुख्य अर्थशास्त्री गौरा सेनगुप्ता के अनुसार, कमजोर मानसून सीधे आम आदमी की थाली पर वार करेगा:

​फूड इन्फ्लेशन (खाद्य महंगाई): देश में अप्रैल के महीने में खुदरा महंगाई दर 3.48% थी, जिसमें खाद्य महंगाई का बड़ा हाथ था। यदि जुलाई-अगस्त में सूखा पड़ता है, तो खाने-पीने की चीजों के दाम आसमान छुएंगे और कुल खुदरा महंगाई दर 5.5% के पार जा सकती है।

​दोहरी मार (वैश्विक युद्ध का असर): भारत इस समय पहले से ही पश्चिम एशिया संकट (ईरान युद्ध) के कारण कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और थमे हुए सप्लाई चेन से जूझ रहा है। ऊपर से डीजल महंगा होने के कारण मालभाड़ा बढ़ रहा है। ऐसे में मानसून की विफलता महंगाई को और ज्यादा भड़काएगी।

​ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर ब्रेक: देश की आधी आबादी खेती से रोजी-रोटी कमाती है। फसलों के नुकसान से ग्रामीण इलाकों में आमदनी घटेगी, जिससे ट्रैक्टर, दो-पहिया वाहन और रोजमर्रा के सामानों (FMCG) की बिक्री में भारी गिरावट आ सकती है।

​🏛️ क्या है सरकार की तैयारी और आगे की राह?

​हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि भारत अब पूरी तरह मानसून का बंधक नहीं रहा है। देश के पास खाद्यान्न (अनाज) का पर्याप्त बफर स्टॉक मौजूद है, इसलिए भुखमरी जैसा संकट नहीं होगा। लेकिन बाजार में कीमतों को काबू में रखना रिजर्व बैंक (RBI) और सरकार के लिए एक बड़ी परीक्षा होगी।

​सरकार अब ब्लॉक स्तर पर आकस्मिक कृषि योजनाएं (Contingency Plans) तैयार कर रही है, ताकि कम पानी में उगने वाली फसलों को बढ़ावा दिया जा सके।

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