NK संगवारी जनता के गोठ: एक्सक्लूसिव ग्राउंड रिपोर्ट जमीन भी खोई, हक भी छीना: पावर कंपनी के 'संविदा जाल' में उलझा भू-विस्थापितों का भविष्य, CSPDCL के विद्युत संविदा कर्मचारियों को मिला वेतन कटौती का 'इनाम'!
रायपुर।:कहते हैं विकास की नींव हमेशा किसी न किसी के त्याग पर रखी जाती है, लेकिन जब त्याग करने वालों के साथ ही छल होने लगे, तो व्यवस्था पर से भरोसा उठ जाता है। छत्तीसगढ़ स्टेट पावर जनरेशन कंपनी लिमिटेड (CSPGCL) द्वारा मड़वा-तेन्दूभाठा परियोजना के द्वितीय चरण के भू-विस्थापितों के लिए जारी किया गया हालिया नियुक्ति आदेश इसी दर्द और बेबसी की जीती-जागती मिसाल बन चुका है। अपनी उपजाऊ पुश्तैनी जमीनें खोकर परमानेंट सरकारी नौकरी की आस लगाए बैठे प्रभावित परिवारों को कंपनी ने 'संविदा नौकरी' का ऐसा झुनझुना थमाया है, जिससे पूरा विस्थापित समाज खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है।
एक कड़वा सच: सरकारी दस्तावेजों की शर्तों में छुपा विस्थापितों का दर्द
NK संगवारी के हाथ लगे आधिकारिक दस्तावेजों के पन्ने विकास के दावों के पीछे छिपे स्याह सच को बयां करते हैं। आदेश के मुताबिक, जिन परिवारों की जमीनें इस उम्मीद में ली गई थीं कि उनके बच्चों का भविष्य सुरक्षित होगा, उन्हें "कनिष्ठ परिचारक" के रूप में केवल तीन वर्षों के लिए संविदा (Contract) पर रखा जा रहा है।
इस नीति की क्रूरता आदेश की शर्त संख्या 4 में साफ झलकती है, जिसमें लिखा है कि 'संविदा नियुक्ति प्राप्त कर्मियों को कंपनी पर नियमितीकरण की बाध्यता नहीं होगी'। यानी जिस जमीन पर पीढ़ियों से उनका हक था, उसे गंवाने के बदले उन्हें एक ऐसी नौकरी मिली है जिसकी म्याद सिर्फ 3 साल है और जिसे आगे जारी रखने की कोई कानूनी गारंटी भी नहीं है।
CSPDCL के विद्युत संविदा कर्मचारियों के साथ सबसे बड़ा भद्दा मजाक
इस पूरे मामले का सबसे मार्मिक और हैरान करने वाला पहलू यह है कि इस सूची में कई ऐसे प्रभावित भी शामिल हैं, जो पहले से ही CSPDCL (छत्तीसगढ़ स्टेट पावर डिस्ट्रिब्यूशन कंपनी लिमिटेड) में विद्युत संविदा कर्मचारी के रूप में अपनी जान जोखिम में डालकर पूरी निष्ठा से सेवाएं दे रहे हैं।
वेतन में भारी कटौती, भविष्य अंधकार में: ये अनुभवी विद्युत संविदा कर्मचारी वर्तमान में CSPDCL में फील्ड पर काम करते हुए करीब ₹20,000 मासिक वेतन पा रहे हैं। लेकिन इस नए 'भू-विस्थापित कोटे' के आदेश के तहत उन्हें मिलने वाला फिक्स वेतन मात्र ₹12,832 तय किया गया है।
जमीन खोने का यह कैसा इनाम?: अपनी कीमती जमीनें खोने के बाद इन विद्युत संविदा कर्मचारियों को उम्मीद थी कि उन्हें विभाग में नियमित (परमानेंट) कर दिया जाएगा। लेकिन इसके उलट, उन्हें हर महीने ₹7,000 से ₹8,000 के सीधे आर्थिक नुकसान और मानसिक प्रताड़ना की खाई में धकेल दिया गया है। वे आज खुद को दोहरी मार का शिकार और पूरी तरह ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।
फ्रेशर्स के सपनों पर भी वज्रपात: इस सूची में कई ऐसे युवा और फ्रेशर्स भी हैं जो पहली बार नौकरी की दुनिया में कदम रख रहे हैं। इस कमरतोड़ महंगाई के दौर में मात्र ₹12,832 के नियत वेतन और अस्थाई भविष्य के सहारे वे अपनी जिंदगी की शुरुआत कैसे करेंगे, इसका जवाब किसी जिम्मेदार अधिकारी के पास नहीं है।
शर्तों की बेड़ियां: अधिकारों की कटौती
आदेश की अन्य शर्तें विस्थापितों की बेबसी को और गहरा करती हैं। नियमित कर्मचारियों की तुलना में इन्हें न तो बुनियादी सुविधाएं मिलेंगी और न ही मानवाधिकारों के अनुकूल अवकाश। तीन वर्षों के बाद उनके सेवा विस्तार का फैसला पूरी तरह से कंपनी के मूल्यांकन की दया पर निर्भर करेगा, जिससे उनके सिर पर हमेशा नौकरी जाने की तलवार लटकती रहेगी।
जनता के गोठ: न्याय की गुहार
यह केवल एक नौकरी का आदेश नहीं, बल्कि उन आंसुओं और कुर्बानियों का अपमान है जो विस्थापितों ने अपनी मिट्टी छोड़ते वक्त दी थीं। भू-विस्थापितों और CSPDCL के पीड़ित विद्युत संविदा कर्मचारियों का एक ही गंभीर सवाल है—"क्या छत्तीसगढ़ के विकास के लिए हमारी जमीनों और हमारी मेहनत की यही कीमत है?"
NK संगवारी प्रभावित परिवारों और इन कर्मठ बिजली कर्मचारियों के इस दर्द और उनके हक की लड़ाई में उनके साथ मजबूती से खड़ा है। पावर कंपनी और शासन को इस संविदा नीति पर तुरंत पुनर्विचार करना चाहिए। आदर्श पुनर्वास नीति के तहत सभी पीड़ितों को संविदा के बजाय नियमित (परमानेंट) पदों पर समायोजित किया जाए, ताकि विकास की इस दौड़ में कोई खुद को बेसहारा न समझे।
ब्यूरो :- NK संगवारी
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