छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: जमीन गई तो मिलेगी 'नियमित नौकरी'; SECL का '2 एकड़' वाला नियम अवैध घोषित
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: जमीन गई तो मिलेगी 'नियमित नौकरी'; SECL का '2 एकड़' वाला नियम अवैध घोषित
🏛️ हाई कोर्ट का नजीर बनने वाला फैसला
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने भूमि अधिग्रहण और विस्थापितों के अधिकारों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और नजीर बनने वाला फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ कर दिया है कि सार्वजनिक क्षेत्र की कोल कंपनी SECL (South Eastern Coalfields Limited) अपनी आंतरिक गाइडलाइनों का हवाला देकर छोटे और सीमांत विस्थापित किसानों को रोजगार देने से मना नहीं कर सकती।
जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस अमितेन्द्र किशोर प्रसाद की खंडपीठ (Division Bench) ने कोरबा जिले के ग्राम पाली के 23 भू-विस्थापित परिवारों को बड़ी राहत देते हुए SECL को 45 दिनों के भीतर 'नियमित नियोजन' (Permanent Job) प्रदान करने के सख्त निर्देश दिए हैं।
क्या था पूरा मामला?
यह विवाद कोरबा जिले के पाली क्षेत्र से शुरू हुआ था, जहां SECL ने अपनी कोयला खदान परियोजनाओं के विस्तार के लिए स्थानीय ग्रामीणों की पैतृक जमीनों का अधिग्रहण किया था। अधिग्रहण के वक्त विस्थापितों को उचित मुआवजे के साथ परिवार के एक योग्य सदस्य को स्थाई नौकरी देने का भरोसा दिया गया था।
जमीन पर कब्जा लेने के बाद जब ग्रामीणों ने नौकरी के लिए आवेदन किया, तब SECL प्रबंधन ने कोल इंडिया लिमिटेड (CIL) की एक आंतरिक नीति का हवाला देते हुए आवेदनों को खारिज कर दिया। कंपनी का तर्क था कि नौकरी केवल उन्हीं परिवारों को दी जा सकती है जिनकी न्यूनतम 2 एकड़ या उससे अधिक जमीन अधिग्रहित हुई हो। चूंकि पाली के ये 23 परिवार छोटे और सीमांत किसान थे और उनकी जमीन इस सीमा से कम थी, इसलिए उन्हें अपात्र घोषित कर दिया गया, जिसके खिलाफ ग्रामीणों ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
हाई कोर्ट की SECL को कड़ी फटकार: "संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन"
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट की खंडपीठ ने SECL के '2-एकड़' वाले नियम को पूरी तरह से मनमाना, अवैध और न्यायसंगत सिद्धांतों के खिलाफ पाया। कोर्ट ने इस दौरान कई महत्वपूर्ण कानूनी टिप्पणियाँ कीं:
- समानता का अधिकार: अदालत ने कहा कि एक छोटे किसान के लिए उसकी आधा एकड़ जमीन भी उतनी ही कीमती है जितनी किसी बड़े किसान के लिए 5 एकड़। जमीन छिनने के बाद दोनों ही समान रूप से 'भूमिहीन' और 'विस्थापित' हो जाते हैं। ऐसे में जमीन के आकार पर वर्गीकरण करना समानता के सिद्धांत का उल्लंघन है।
- आजीविका ही जीवन का अधिकार: कोर्ट ने स्पष्ट रेखांकित किया कि किसी नागरिक से उसकी आजीविका का एकमात्र साधन (खेती की जमीन) छीन लेना और फिर उसे रोजगार न देना, संविधान के अनुच्छेद 21 (जीने के अधिकार) का खुला हनन है।
- कंपनी के नियम राज्य की नीति से ऊपर नहीं: अदालत ने कहा कि जिस समय जमीन ली गई, उस समय 'छत्तीसगढ़ आदर्श पुनर्वास नीति' लागू थी, जिसमें ऐसी कोई न्यूनतम सीमा तय नहीं थी। SECL या कोल इंडिया का कोई भी आंतरिक सर्कुलर राज्य सरकार की वैधानिक पुनर्वास नीति को ओवरराइड (अमान्य) नहीं कर सकता।
कोर्ट के तीन बड़े और कड़े निर्देश
- 1. खारिज आदेश निरस्त: हाई कोर्ट ने कम जमीन का हवाला देकर 23 ग्रामीणों के आवेदनों को खारिज करने वाले SECL के पुराने आदेशों को तुरंत प्रभाव से रद्द (Quash) कर दिया है।
- 2. नियमित नियोजन के निर्देश: अदालत ने साफ किया है कि इन विस्थापितों को कोई अस्थायी, ठेका (Contractual) या आउटसोर्सिंग वाला काम नहीं, बल्कि उनकी शैक्षणिक योग्यता के आधार पर नियमित और स्थाई पद (Regular Employment) दिया जाए।
- 3. 45 दिनों की डेडलाइन: हाई कोर्ट ने SECL प्रबंधन को इन सभी 23 मामलों की फाइलें दोबारा खोलने, पात्रता की स्क्रूटनी करने और नियुक्ति प्रक्रिया पूरी करने के लिए 45 दिनों का कड़ा समय दिया है।
फैसले के दूरगामी मायने और व्यापक असर
कोरबा जिले के कुसमुंडा, गेवरा, दीपका और पाली जैसे बड़े माइनिंग हब में हजारों एकड़ जमीन अधिग्रहित की जाती है। इस फैसले से न केवल पाली के इन 23 परिवारों के घरों में न्याय का उजाला हुआ है, बल्कि कोरबा और रायगढ़ समेत पूरे प्रदेश के उन सैकड़ों छोटे विस्थापित किसानों के लिए भी स्थाई नौकरी का रास्ता साफ हो गया है जिनकी फाइलें कोल कंपनियों ने 'कम जमीन' का बहाना बनाकर ठंडे बस्ते में डाल दी थीं।
अब कोल इंडिया को अपनी आंतरिक विस्थापन और रोजगार नीतियों में बड़ा सुधार करना होगा।

Comments
Post a Comment