​विद्युत विभाग के संविदा कर्मचारियों का सरकार से सीधा सवाल: "जब वन विभाग के दैनिक वेतन भोगी/ कलेक्टर दर / आकस्मिकता निधि कर्मचारी नियमित हो सकते हैं, तो नियमों के तहत भर्ती हुए हम क्यों नहीं?"





स्थान: रायपुर | दिनांक: 28 मई 2026

स्रोत: NK संगवारी न्यूज़ एक्सक्लुसिव

​छत्तीसगढ़ विद्युत कर्मचारी संघ के महामंत्री कमलेश भारद्वाज ने शासन की नीति पर उठाए गंभीर सवाल।​स्वीकृत और रिक्त पदों पर पूरी शासकीय प्रक्रिया के तहत हुई थी संविदा भर्ती, फिर भी नियमितीकरण से वंचित।​कर्मचारियों का बड़ा तर्क: "विद्युत विभाग खुद राजस्व कमाता है, हमारे नियमितीकरण से सरकार के खजाने पर नहीं पड़ेगा एक रुपये का भी अतिरिक्त बोझ।"

छत्तीसगढ़ के विद्युत विभाग में वर्षों से अपनी सेवाएं दे रहे संविदा कर्मचारियों ने अब सरकार और प्रबंधन के खिलाफ अपनी आवाज पूरी तरह बुलंद कर दी है। 'NK संगवारी न्यूज़ एक्सक्लुसिव' से विशेष बातचीत करते हुए छत्तीसगढ़ विद्युत कर्मचारी संघ के महामंत्री कमलेश भारद्वाज ने शासन के हालिया फैसलों और दोहरी नीति पर सीधा और तीखा सवाल दागा है।महामंत्री कमलेश भारद्वाज ने वन विभाग के 10 वर्ष की सेवा पूरी कर चुके दैनिक वेतन भोगी/कलेक्टर दर/ आकस्मिकता निधि कर्मचारियों को नियमित करने की दिशा में शासन की पहल का स्वागत किया, लेकिन साथ ही बिजली विभाग के संविदा कर्मियों के प्रति अपनाई जा रही अनदेखी पर गहरी नाराजगी जताई। उन्होंने पूछा कि जब वन विभाग के कर्मचारियों को वित्त विभाग से नियमितीकरण की हरी झंडी मिल सकती है, तो बिजली विभाग के संविदा कर्मियों के साथ यह सौतेला व्यवहार क्यों किया जा रहा है?

पूरी पारदर्शिता और नियमित नियमों के तहत हुई थी भर्ती

​'NK संगवारी न्यूज़' से चर्चा के दौरान संघ के महामंत्री कमलेश भारद्वाज ने तकनीकी पक्षों को स्पष्ट करते हुए बताया कि हमारी नियुक्ति कोई तात्कालिक या बैकडोर एंट्री नहीं है। विभाग के संविदा कर्मचारियों की भर्ती शासन द्वारा स्वीकृत और रिक्त पदों के विरुद्ध (Against Vacant Posts) की गई थी। इस भर्ती प्रक्रिया में योग्यता, शैक्षणिक मापदंड, आयु सीमा और शासन के आरक्षण नियमों का अक्षरशः पालन किया गया था—यानी वही नियम जो एक नियमित कर्मचारी की भर्ती के लिए लागू होते हैं। उन्होंने कहा कि जब योग्यता, परीक्षा और चयन प्रक्रिया पूरी तरह समान है, तो सेवा शर्तों में यह भेदभाव पूरी तरह से अलोकतांत्रिक है।

सरकार पर शून्य वित्तीय भार, विभाग खुद सक्षम

​कमलेश भारद्वाज ने एक बेहद मजबूत आर्थिक तर्क सामने रखते हुए कहा कि वन विभाग या अन्य शासकीय विभागों के नियमितीकरण पर सरकार को अपने मूल बजट से अतिरिक्त वित्तीय प्रावधान करना पड़ता है, जिससे खजाने पर असर होता है। इसके विपरीत, विद्युत विभाग एक स्वायत्त और सीधे तौर पर राजस्व अर्जित करने वाला (Revenue-Generating) विभाग है। बिजली कंपनियां जनता से सीधे राजस्व वसूलती हैं, इसलिए संविदा कर्मचारियों को नियमित करने से प्रदेश के वित्त विभाग को किसी आर्थिक खर्च का सामना नहीं करना पड़ेगा। विभाग अपने स्वयं के राजस्व से ही नियमित वेतनमान का प्रबंधन करने में पूरी तरह आत्मनिर्भर और सक्षम है।

'समान कार्य-समान वेतन' के अधिकार की अनदेखी

जान जोखिम में डालकर 24 घंटे प्रदेश की बिजली आपूर्ति व्यवस्था को सुचारू रखने वाले इन कर्मचारियों का कहना है कि वे नियमित कर्मचारियों के कंधे से कंधा मिलाकर समान जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। इसके बावजूद उन्हें उनके भविष्य की सुरक्षा और नियमितीकरण के अधिकार से वंचित रखा जा रहा है।

महामंत्री कमलेश भारद्वाज का दो टूक बयान:

"हम शासन को राजस्व कमाकर देने वाले विभाग की रीढ़ की हड्डी हैं। हमारी मांग पूरी तरह से न्यायसंगत, तार्किक और कानूनी रूप से मजबूत है। विद्युत विभाग को सोचना होगा कि जो कर्मचारी पूरी चयन प्रक्रिया से गुजर कर आए हैं, उन्हें उनका हक कब मिलेगा? यदि शासन ने वन विभाग की तर्ज पर तुरंत कैबिनेट और वित्त विभाग से समन्वय कर हमारे नियमितीकरण की नीति जारी नहीं की, तो प्रदेश के हजारों संविदा कर्मचारी व्यापक आंदोलन और न्यायालयीन शरण लेने के लिए बाध्य होंगे।"

📌 मुख्य बिंदु (Key Highlights):

​भर्ती का आधार: संविदा कर्मियों की भर्ती पूर्णतः स्वीकृत रिक्त पदों पर, नियमित भर्ती नियमों और आरक्षण के तहत हुई है।

वित्तीय आत्मनिर्भरता: विद्युत विभाग राजस्व जनरेट करने वाला विभाग है, अतः सरकार के खजाने पर कोई अतिरिक्त आर्थिक बोझ नहीं पड़ेगा।

मुख्य मांग: वन विभाग की तर्ज पर विद्युत विभाग के संविदा कर्मचारियों के लिए भी तुरंत नियमितीकरण की नीति और आदेश जारी किए जाएं।

ब्यूरो रिपोर्ट, [NK संगवारी न्यूज़]

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